शुक्रवार, 11 नवम्बर 2011

Tumko suchit ho...

कलम तलवार पर भारी पड़ी है, तुमको सूचित हो
कवी ने फिर कोई रचना गढ़ी है, तुमको सूचित हो
कभी जनता ने जिनको मुल्क की पतवार सौपी थी
उन्ही के सामने जनता खड़ी है, तुमको सूचित हो !!
~~rishu~~

सोमवार, 15 अगस्त 2011

फिर कैसा पंद्रह अगस्त ????

किस बात पे मै अभिमान करू
मैं क्यूँ जन गण मन गान करूँ
जब लोकपालकों के ऊपर जनतंत्र नहीं
फिर कैसे कह दें की हम परतंत्र नहीं
सत्ता जो थी देन अमर जवानों की
बन गयी है जागीर सियासतदानो की
शिक्षा है पर आरक्षण की मारी है
पढ़े लिखों की किस्मत में लाचारी है
अब भी मन को धर्म भेद ने पकड़ा है
अब भी जाती मूल गोत्र ने जकड़ा है
शब्दों,छंदों पर भाषा के पहरे हैं
माँ भारती के घाव अभी भी गहरे हैं
राष्ट्र हुआ इन नयी बेडियो का अभ्यस्त
अंतर्मन अवसादग्रस्त
फिर कैसा पंद्रह अगस्त ??!!!!

~~rishu~~

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

Ek Chehra Tha Do aankhein Thi....

कुछ बाते जगजाहिर थी , कुछ लोगों की अफवाहें थी
अब उस पथ के पथिक थे हम जिस पथ में बस विपदाएं थी
हम समझ न पाए कब कैसे हाथों से अंकुश छूट गए
यूं मन के रथ दिग्भ्रमित हुए , संगी साथी सब रूठ गए
इस लोक लाज के वश होकर जो बात कभी न मानी थी
आना-कानी करते करते, आखिर मनमानी कर बैठे ,
एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे .
एक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे !!

~~rishu~~

शनिवार, 25 जून 2011

Madhushalaa............

जो मधु के मद में डूबे हैं
वो मधुघट बड़े अजूबे हैं
ये मृदु पात्र मधु पीते हैं
छण भंगुर जीवन जीते हैं
ये मदिरा पीने वालो के
हाथों में टकराते हैं...गिर. टूट. छटक कर बिखर कही फिर यादो में खो जाते हैं
यूँ लगता है हम मधुघट हैं..और जीवन एक मधुशाला है
और वो जो ऊपर बैठा है.. वो मदिरा पीने वाला है !!

~~rishu~~

सोमवार, 30 मई 2011

Aaj Mai Khush Hoo....


आज की शाम बहुत उदास लग रही थी
मानो दिन की धूप ने उसका सारा तेज़ छीन लिया हो
चेहरे पे पहले जैसी मुस्कराहट भी नहीं थी
आज तो घर के पीछे आँगन में पंछियों का जमावड़ा भी नहीं था
सामने आसमान पे कुछ गिद्ध जरुर मंडरा रहे थे
जैसे आस पास उन्हें कोई मांस का लोथड़ा दिख गया हो
सामने का पार्क भी खाली था ...हर तरफ सन्नाटा
आज का चाँद भी कुछ सांवला सा लग रहा है
और हवा तो जैसे सांस रोक कर बैठ गयी है..........
*******
ये शाम रोज आती थी
हंसती मुस्कुराती उल्लास मनाती
ये चाँद भी रोज चमकता था कभी भी सांवला नहीं लगा
और हवा ,
ये पगली तो ऐसे चलती थी मानो कन्धा थपथपा रही हो
पर ये सब मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा
...ऐसा लगता था मानो मेरा उपहास किया जा रहा है
*******
लेकिन आज मुझे सब कुछ अच्छा लग रहा है,
आज जब प्रकृति रो रही है ,मुझे ख़ुशी हो रही है,
एक अजीब सा अपनत्व है इस माहौल में..मानो अंतर की पीड़ा बाहर आ गयी हो;

बहोत समय के बाद कुछ अच्छा लगा है !!
बहोत समय के बाद मै मुस्कुराया हूँ !!

~~rishu~~

रविवार, 13 फरवरी 2011

O my valentine..........


 उम्मीद तुझसे तो कम ही थी मगर खुद से थी
उम्मीद थी की मेरा हौसला न टूटेगा
ये साथ मेरी तरफ से कभी न छूटेगा
उम्मीद ये थी की मुझसे सवाल कम होंगे
जो मेरी ओर उठेंगे वो हाथ कम होंगे
उम्मीद खुद से नहीं अपने रहबरों से थी
की कुछ भी होगा मगर ये तो साथ देंगे मेरा
आज जब अपनी उम्मीदों पे नज़र डालूं तो
ऐसा लगता है जैसे जिंदगी ख़तम सी है
वो सब जो मुझको मेरी जां से ज्यादा प्यारे हैं
चाहते हैं की अपनी जां को अब मैं जां न कहूँ
वो सारे बैठे मेरी हसरतों की मैयत पर
चाहते हैं मेरे वजूद में अब मैं न रहूँ
इसलिए......
आज मैं तुझसे सवाल करता हूँ
बता क्या तुझको भुलाने का हक मैं रखता हूँ?
तुझको पाना तो मुकद्दर में नहीं है मेरे
क्या तुझको छोड़कर जाने का हक मै रखता हूँ?? 

~~rishu~~

शनिवार, 18 दिसम्बर 2010

Pagli Ladki...........


दोस्तों आज काफी समय के बाद कुछ लिखा...डॉ. साहब की रचना "कोई दीवाना कहता है " के reply को आप सभी ने सराहा...आज फिर से उन्ही की एक प्रसिद्द रचना "पगली लड़की " को आगे बढाने की एक छोटी सी कोशिश है आशा है आप सभी का आशीर्वाद मिलेगा......

अमावास की काली रातों में दिल कुछ भर सा जाता है
जाने हर रात कलेजे में एक दर्द ठहर सा जाता है
आवाजें सब चुप रहती हैं, सन्नाटे चिल्लाते हैं
रोशनदानो के रस्ते अन्दर, स्याह अँधेरे आते हैं
तन्हाई का हर लम्हा, सदियों सा लम्बा लगता है
जिन्दा हूँ पर जीने का, एहसास अचम्भा लगता है
ऐसे में फिर यादों में वो, पगली लड़की आ जाती है
और उस पगली लड़की के बिन फिर वीरानी छा जाती है !!

अब तो जाने क्या होता है हर आहट से डरते हैं
खिड़की ,दरवाजे, छत, बिस्तर  उपहास हमारा करते हैं
लिखने बैठू तो कविता के सब शब्द ख़तम हो जाते हैं
कलम चलाने से पहले ही कागज़ नम हो जाते हैं
घर का कोई काम नहीं जचता, न कारोबार सुहाता है
बस समय काटने को पड़ोस का लल्ला पढने आता है
अब ऐसे ही दिन उगता है ,और ऐसे ही दिन कट जाता है
अब घर की चार दीवारों में संसार ख़तम हो जाता है
जब शाम कभी तन्हाई में ये आँखे नम हो जाती है
ऐसे में फिर यादों में वो, पगली लड़की आ जाती है
और उस पगली लड़की के बिन फिर वीरानी छा जाती है !!

अब तो अपनी हर रचना की शुरुआत उसी से करता हूँ  
शब्दों ,छंदों के चित्रों में सब रंग उसी के भरता हूँ
अब तो बाबा, भाभी ,दीदी सब बोलन से घबराते हैं
अब तो हमसे बिन पूछे ही रिश्ते  ठुकराए जाते हैं
अब तो हम घर की चौखट के बहार से भी कतराते  हैं
अब तो भैया भी शहर छोड़कर गाँव मनाने आते हैं
जब दिल में जीवन जीने की इक्षाएं ख़तम हो जाती है
ऐसे में फिर यादों में वो पगली लड़की आ जाती है
और उस पगली लड़की के बिन फिर वीरानी छा जाती है !!

हलाकि अब उसका मेरा साथ असंभव लगता है
लेकिन उसके न होने का एहसास भी दिल को लगता है
वो पगली लड़की अब भी मेरी ग़ज़लो में बसती है
उसकी सूरत उसकी सीरत अब भी इस दिल में बसती है
अब भी उसकी बांधी हुई ताबीज गले में लटकी है
अब भी उसकी साँसों से मेरी साँसे अटकी है
अब भी जाने क्यों खुद अपना ,हर शब्द अनाड़ी लगता है
अब भी पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है ,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भरी लगता है !!

~~rishu~~