रविवार, 26 जनवरी 2014

On this Republic day........

Dear motherland..

जल्द तुम्हारे ज़ख्मो को हम फिर से चंगा कर देंगे,
दिल्ली से रावलपिंडी तक गंगा गंगा-कर देंगे,
हम टूट चुके हैं टुकड़ों में ये दुनिया की नासमझी है,
जिस दिन अपनी पर आ गए सारा विश्व तिरंगा कर देंगे !!

....Happy Republic Day !!

~~rishu~~

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

bas u hi...

तुम्हारे साथ जो ज़ाज़बात बांटे थे कभी....उन्हें कहने में अब अल्फाज़ कम पड़ने लगे हैं.... !!!

~~rishu~~

रविवार, 26 मई 2013

झूठ थी क्या.....????

सोचता हूँ नेह की वो सब ऋचाएं झूठ थीं क्या
उनसे बांटी थीं जो सारी भावनाएं झूठ थीं क्या
आज भी जिस ख्वाब की तामीर पर मुझको यकीन है
उनको पाने की वो सारी लालसाएं झूठ थीं क्या ???
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इन समाजी बंदिशों के साथ साथ सारे ख्वाब बह गए
वो भी शर्मिंदा हुए और हम भी तब खामोश रह गए
मेरी आँखों ने पढ़ी थी उनकी आँखों में कभी जो
सोचता हूँ वो कहानी वो कथाएँ झूठ थी क्या ????
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मानता हूँ वो समय के हाथ में मजबूर थे तब
जो मिला सकती थी हमको वो दो राहें दूर थी तब
मानता हूँ सब मगर ये दिल अभी भी पूछता है
रूठकर फिर मान जाने की अदाएं झूठ थी क्या ????

~~rishu~~

रविवार, 23 सितंबर 2012

Still waiting.... :(





कहूँ कैसे तुम्हारे बिन ये रात और दिन गुज़ारे हैं 

भरी महफ़िल में भी तनहा कई पल-छिन गुज़ारे  हैं 
मिलोगे तुम कभी शायद इसी एहसास में जीकर
न जाने कितने लम्हे हमने तारे गिन गुज़ारे हैं !!

~~rishu~~

शनिवार, 22 सितंबर 2012

एक आंसू..जो..


एक आंसू..जो..
अंतर्मन की व्यथा से उपजा पला-बढ़ा था
मर्यादा के बीच दबा कुचला सा पड़ा था 
अब तक जो संवेदनाओ के बीच बंद था 
जो कुंठा की जंजीरों से बंधा खड़ा था 
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आज अचानक जाने कैसे उबल उठा है 
नयनसिंधू में कैसा भीषण ज्वार उठा है 
दिल के सारे अरमानों को बहा ले गया
ज़ीने की उम्मीद ना जाने कहाँ ले गया 
अब इस जिंदा लाश को लेकर कहाँ रहूँगा 
अपने जन के हाथों कितनी बार मरूँगा

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आखिर कब तक यूँ घूँट खून का पीना होगा

कब तक यूँ घुट-2 कर मुझको जीना होगा
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कब तक अपनी मज़बूरी से प्यार करूँ मैं
कब तक सबसे मनचाहा व्यव्हार करू मैं 
इक्षा है सर्वस्व समर्पण कर जाऊं अब
यूँ ज़ीने से बेहतर है की मर जाऊं अब  !!

~~rishu~~

रविवार, 22 जुलाई 2012

आज फिर.....


आज फिर तू पास नहीं है
तेरे होने का अहसास नहीं है
बहुत मुश्किल है यूं तो भूलना तुझको
फिर भी कहता हूँ की तू याद नहीं है

कभी गुजरी थी जो रातें
तेरे पहलू में सर रख कर
अब इन रातों में उन रातों में अंतर खास नहीं है
तू तब भी ख्वाब थी मेरा
तू अब भी एक तसव्वुर है
मगर पहले से अब तेरे मेरे ज़ज्बात नहीं हैं

~~rishu~~

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

Tumko suchit ho...

कलम तलवार पर भारी पड़ी है, तुमको सूचित हो
कवी ने फिर कोई रचना गढ़ी है, तुमको सूचित हो
कभी जनता ने जिनको मुल्क की पतवार सौपी थी
उन्ही के सामने जनता खड़ी है, तुमको सूचित हो !!
~~rishu~~