गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मिजाज़ -ऐ -इश्क..........



हम तेरे इश्क में जन -ऐ -वफ़ा सब कुछ लुटा बैठे
तेरी साँसों की खैरियत के लिए जां तक लुटा बैठे ,

अब तक तो ज़माने में बहुत नाम था अपना
तेरी उल्फत में ज़माने को भी दुश्मन बना बैठे ,

तू भी न रही ,दुनिया भी नज़र फेर चुकी है ,
सोचा था क्या ,क्या हुआ और क्या करा बैठे ,

जन्नत की तमन्ना थी हयात-ऐ-दहर के बदले
गैरों की इबादत में सब अपने गँवा बैठे ,

ज़माने की नज़र में तो तू आ भी नहीं सकती
एक हम है जो तेरी याद में महफिल सजा बैठे ,

यूं तो कभी चढ़ती न थी बोतल तुझे 'rishu'
उनकी नज़र के जाम जिगर में चढा बैठे .


~~rishu~~

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