गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

चार लाइनें.........


हर कदम एक लम्बा सफ़र बन गया है
ये जीवन भी एक खेलघर बन गया है
सृष्टिकर्ता भी अब जिससे डरने लगा है
कल का इंसान वो जानवर बन गया है!

~~rishu~~

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, लेखन कार्य के लिए बधाई
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