गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

ब्रह्मज्ञान................



आज का इंसान जा रहा ब्रह्मज्ञान से दूर
मैं कहता हूँ है सही दुनिया का यह दस्तूर
  क्यूंकि गर संसार ब्रह्मज्ञानी हो जाता
फिर बतलाओ सारा रूपया कौन कमाता
कैसे होती चोरी,
कैसे होता घोटाला
कैसे चलता खेल मेज के नीचे वाला
बिगड़ा बेटा खून बाप का कैसे पीता
और कैसे
संसार बिना तनख्वाह के जीता
फिर तो लोग बड़े ही ईश्वरमय हो जाते
हर वस्तु में स्वयं
स्वयं में ईश्वर पाते
फिर न होती चोरी न होता घोटाला
हर वस्तु का हर प्राणी होता रखवाला 

~~rishu~~

12 टिप्‍पणियां:

  1. चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं, और भी अच्छा लिखें, लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
    ---

    ---
    हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

    उत्तर देंहटाएं
  2. सचमुच इसे ब्रह्मज्ञान कह सकते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. vaah kyaa gyaan sootar nikaalaa hai achha vyang hai shubhakaamanaayeM savagat

    उत्तर देंहटाएं
  4. ha.n mere man ki baat keh di...mere mann me bhi kayi baar aise vichar uthal-puthal karte hai...sidhi baat.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर रचना
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  6. Aag laga di bhai ji ..
    Kya karara likha hai ...
    bas maza aa gaya..

    Likhte achha ho ye to pata tha..
    par hat-prabh kar diya aapne..
    thoughts n intensions r very very clear n to the point...
    Vyang ki drishti se this is one of d best i hv ever read...

    congratulations ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. हुज़ूर आपका भी एहतिराम करता चलूं......
    इधर से गुज़रा था, सोचा सलाम करता चलूं..
    www.samwaadghar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं