सोमवार, 2 नवंबर 2009

Sochta hoo.......................

मेरी  माँ  ने मेरे हिस्से में क्या रक्खा था  
उसने ये राज़ भी  सीने में दबा रक्खा था  !!

कोई उम्मीद नहीं थी पर अब भी जिंदा हैं  
हमें तो माँ की दुआओं ने बचा रक्खा था  !!
 
अब जो मिलती है तो राह बदल लेती है  
हमने जिसके लिए इस दिल को सज़ा रक्खा था !!

कभी मिलना तो ज़रा दूरिया रखना उनसे 
ये वो कातिल हैं जिन्हें दुश्मन ने बना रक्खा था !!

साकी अब छोड़ दे ये जाम पिलाना मुझको
इसने कई रोज मेरे पुरखो को खफा रक्खा था  !!

सोचता हूँ की अब कह दूं अलविदा उसको 
कभी उल्फत में जिसका नाम वफ़ा रक्खा था  !!

~~rishu~~

3 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ही सुंदर और शानदार रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है!
    मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

    उत्तर देंहटाएं
  2. badhiya likhte hain aap.... shahar-e-Lucknow ka naam padh ke aai thi, lucknow ko paya bhi yahan

    उत्तर देंहटाएं