बुधवार, 2 दिसंबर 2009

For sale......



अज़ब हाल देखो नयी रौशनी का
दुनिया में क्या-क्या व्यसन बिक रहे हैं
तन बिक चुका है ,मन बिक चुका है
सदन बिक चुका अब वतन बिक रहे हैं ....

किरण बिक चुकी है हिर
बिक चुके हैं
करम बिक चुके अब धरम बिक रहे हैं
बुजुर्गो की शान और ईमान खो ....
चंद नोटों की खातिर अपन बिक रहे हैं

अनोखा तमाशा यहाँ का भी 'Rishu'
सरे आम दूल्हा -दुल्हन बिक रहे हैं
जरा जा के उन माँओं बहनों से पूछो
गोदी के जिनके ललन बिक रहे हैं

ज़माने के मालिक जरा होश में आ
लंगोटी से ज्यादा कफ़न बिक रहे हैं
हाल ये है की झूटी प्रशंसा की खातिर

कवी और कवी के कलम बिक रहे हैं !!

~~rishu~~


10 टिप्‍पणियां:

  1. कलम न बेचना कवि
    यह तो रचता है रवि

    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. rishu ji,
    sampurn desh ke haalaat ka sateek chitran kiya hai aapne, badhai aur shubhkamnayen.

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  3. bahut acchhi kavita!!
    sadhuwaad!!

    aaj ke haalaat main har chheej bik rahi hai,
    gandhi tere desh main, khuda bik raha hai!!

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  4. behtareen kaha..... the last stanza is very excellent......
    zamane ke malik zara hosh mein aa...wah

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  5. लाजवाब्!
    जमाने के सच को बयाँ करती बहुत ही बेहतरीन लगी ये रचना.....
    धन्यवाद्!

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