शनिवार, 27 मार्च 2010

अंतर्मन...................


आज मेरे सामने खुशियों से ज्यादा ग़म हैं,
फिर भी लगता है इन आँखों में नमी कुछ कम हैं,
 
भूल जाना चाहता हूँ... कौन हूँ और क्या हूँ मैं,
लहलहाता खेत या तपता हुआ सहरा हूँ मैं,
मैं ज़मी की धूल हूँ या हूँ पर्वत का शिखर,
चौदवीं का चाँद हूँ या टूटता तारा हूँ मैं,
 
ढूँढने निकला जो खुद को खुद जहाँ में खो गया,
सुख से कोसों दूर दुःख के आँचलों में सो गया,
मैं मेरी पहचान भी अब भूलता सा जा रहा हूँ,
पर दिल में रोता जा रहा हूँ....
जाने क्यों रोता जा रहा हूँ????

~~rishu~~

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