रविवार, 13 फ़रवरी 2011

O my valentine..........


 उम्मीद तुझसे तो कम ही थी मगर खुद से थी
उम्मीद थी की मेरा हौसला न टूटेगा
ये साथ मेरी तरफ से कभी न छूटेगा
उम्मीद ये थी की मुझसे सवाल कम होंगे
जो मेरी ओर उठेंगे वो हाथ कम होंगे
उम्मीद खुद से नहीं अपने रहबरों से थी
की कुछ भी होगा मगर ये तो साथ देंगे मेरा
आज जब अपनी उम्मीदों पे नज़र डालूं तो
ऐसा लगता है जैसे जिंदगी ख़तम सी है
वो सब जो मुझको मेरी जां से ज्यादा प्यारे हैं
चाहते हैं की अपनी जां को अब मैं जां न कहूँ
वो सारे बैठे मेरी हसरतों की मैयत पर
चाहते हैं मेरे वजूद में अब मैं न रहूँ
इसलिए......
आज मैं तुझसे सवाल करता हूँ
बता क्या तुझको भुलाने का हक मैं रखता हूँ?
तुझको पाना तो मुकद्दर में नहीं है मेरे
क्या तुझको छोड़कर जाने का हक मै रखता हूँ?? 

~~rishu~~

1 टिप्पणी:

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