सोमवार, 30 मई 2011

Aaj Mai Khush Hoo....


आज की शाम बहुत उदास लग रही थी
मानो दिन की धूप ने उसका सारा तेज़ छीन लिया हो
चेहरे पे पहले जैसी मुस्कराहट भी नहीं थी
आज तो घर के पीछे आँगन में पंछियों का जमावड़ा भी नहीं था
सामने आसमान पे कुछ गिद्ध जरुर मंडरा रहे थे
जैसे आस पास उन्हें कोई मांस का लोथड़ा दिख गया हो
सामने का पार्क भी खाली था ...हर तरफ सन्नाटा
आज का चाँद भी कुछ सांवला सा लग रहा है
और हवा तो जैसे सांस रोक कर बैठ गयी है..........
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ये शाम रोज आती थी
हंसती मुस्कुराती उल्लास मनाती
ये चाँद भी रोज चमकता था कभी भी सांवला नहीं लगा
और हवा ,
ये पगली तो ऐसे चलती थी मानो कन्धा थपथपा रही हो
पर ये सब मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा
...ऐसा लगता था मानो मेरा उपहास किया जा रहा है
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लेकिन आज मुझे सब कुछ अच्छा लग रहा है,
आज जब प्रकृति रो रही है ,मुझे ख़ुशी हो रही है,
एक अजीब सा अपनत्व है इस माहौल में..मानो अंतर की पीड़ा बाहर आ गयी हो;

बहोत समय के बाद कुछ अच्छा लगा है !!
बहोत समय के बाद मै मुस्कुराया हूँ !!

~~rishu~~