शनिवार, 22 सितंबर 2012

एक आंसू..जो..


एक आंसू..जो..
अंतर्मन की व्यथा से उपजा पला-बढ़ा था
मर्यादा के बीच दबा कुचला सा पड़ा था 
अब तक जो संवेदनाओ के बीच बंद था 
जो कुंठा की जंजीरों से बंधा खड़ा था 
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आज अचानक जाने कैसे उबल उठा है 
नयनसिंधू में कैसा भीषण ज्वार उठा है 
दिल के सारे अरमानों को बहा ले गया
ज़ीने की उम्मीद ना जाने कहाँ ले गया 
अब इस जिंदा लाश को लेकर कहाँ रहूँगा 
अपने जन के हाथों कितनी बार मरूँगा

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आखिर कब तक यूँ घूँट खून का पीना होगा

कब तक यूँ घुट-2 कर मुझको जीना होगा
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कब तक अपनी मज़बूरी से प्यार करूँ मैं
कब तक सबसे मनचाहा व्यव्हार करू मैं 
इक्षा है सर्वस्व समर्पण कर जाऊं अब
यूँ ज़ीने से बेहतर है की मर जाऊं अब  !!

~~rishu~~

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